इस दौर में कितने प्रासंगिक हैं मुंशी प्रेमचंद ? Urdu Bazaar

इस दौर में कितने प्रासंगिक हैं मुंशी प्रेमचंद ?

आज मुंशी प्रेमचंद के नाम पर डॉक्ट्रेट की डिग्रियाँ ली जा रही हैं। प्रेमचंद को हर कोर्स में पढ़ाया जा रहा है। प्रेमचंद का साहित्य हर भाषा में अनुदित हो रहा है, लेकिन क्या नयी पीढ़ी के लेखकों एवं पाठकों द्वारा प्रेमचंद ईमानदारी के साथ आत्मसात किये जा रहे हैं? क्या जो मुंशी प्रेमचंद द्वारा उनके साहित्य में स्थापित किये गये आदर्श मानक हैं उसके साथ समकालीन साहित्य न्याय कर रहा है ?

 

दरअसल ये प्रश्न अत्यंत ही गूढ़ एवं विचारणीय हैं जिसका न्यायोचित उत्तर किसी के पास नहीं। आज आम पाठकों के मध्य प्रेमचंद दो भागों में विभक्त हो चुके हैं। पहला भाग वो जिसमें उन्हें ऊँची जाति से लेकर निचली जाति तक के लोगों ने अपनी जाति का विरोधी घोषित कर रखा है तो वहीं दूसरे भाग में मुंशी प्रेमचंद को गुजरे जमाने का रचनाकार साबित करने की असफल सी कोशिश नजर आ रही । दरअसल देखा जाए तो मुंशी प्रेमचंद आज भी एक साहित्यकार के रूप में सामाजिक कुरीतियों के समक्ष बागी तेवर अख्तियार किये किसी मजबूत स्तंभ की भाँति तटस्थ हैं। इतिहास ने एक अच्छे रचनाकार को यदि दुत्कारा है तो उसे रोली, फूलों के हारों से नवाज़ा भी है। प्रेमचंद के साथ भी कहीं न कहीं ऐसी ही परिस्थिति है।

 

एक सामान्य कायस्थ परिवार में जन्म लेने वाला बालक धनपत जिसकी आरंभिक शिक्षा फारसी भाषा से शुरू होती है और जिसने अपने साहित्यिक जीवन की शुरुआत उर्दू भाषा में लिखने के साथ की हो यदि उसका लेखन आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना वो स्वतंत्रता से पूर्व के समय में था तो वह लेखक किसी भी राष्ट्र के लिए बहुमूल्य धरोहर से कम नहीं। उनके साहित्य और जिन चरित्रों का उन्होंने चित्रण किया, जिन समस्याओं के बारे में उन्होंने बात की, आज भी हम उनसे उबरने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। चाहे वह गरीबी हो या जाति के आधार पर भेदभाव, ये चीजें आज भी हमारे समाज में हैं और स्थिति बद से बद्तर हुई है। ‘होरी’ और ‘धनिया’ अब भी हमारे गांवों में हैं।

 

मुंशी प्रेमचंद की आलोचना होती है, होनी भी चाहिए और भरहीक होनी चाहिए क्योंकि वो स्वयं किसी भी विधा को लेकर समस्त मतों को जानने, सुनने और पढ़ने को इच्छुक हुआ करते थे। किंतु समय के साथ आप ही बनते चले गये टेढ़े-मेड़े रास्तों पर चलते हुए हमें मुंशी जी के उन रास्तों की भी कदर करनी होगी जो हमारी सोच से कहीं अधिक पथरीले और दुर्गम थे। नयी युवा पीढ़ी को कतई विस्मृत नहीं करना चाहिए कि कुछ दिन शिक्षा विभाग में नौकरी करने के बाद गांधीजी के आह्वान पर नौकरी छोड़ देने वाले, आर्यसमाजी व विधवा विवाह के प्रबल समर्थक एवं 1910 में अपनी प्रथम रचना 'सोजे वतन' (राष्ट्र का विलाप) के लिए हमीरपुर के जिला कलेक्टर द्वारा तलब किये जाने और जेल भेज देने तक की धमकी के बावजूद निर्भीकता से अपनी कलम के माध्यम से अपने देश के सुनहरे भविष्य की लकीर खींचने वाले राष्ट्रीय धरोहर के साथ कहीं हम अत्यधिक निर्मम एवं निष्ठुर तो नहीं हो रहे ?  कहीं हम अपने नये इतिहास को चमकाने की राह पर चलते हुए पुरानी धूल को साफ करना तो नहीं भूल रहे ?

 

इन्हीं सब विमर्शों के साथ हम मुंशी जी के आदर्शों को अपने आम एवं साहित्यिक जीवन में आत्मसात कर सकें ऐसी कामना के साथ हमें सजग एवं ईमानदार रहना होगा। 

 

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