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क़लमकारी और औरतें Urdu Bazaar

क़लमकारी और औरतें

“औरत”- ज़्यादातर लोग इस अल्फ़ाज़ के माने ख़ूबसूरती से लगाते हैं। एक बला की  ख़ूबसूरती! जो  समाज की पाबंदियों से बंधी रहे, जिसे समेट कर रखा जाए, जो बिखरे तो बग़ैर इजाज़त ना बिखरे। जिनकी शमा से चार दीवारी तो रौशन हो मगर ख़ुद उनकी  मर्ज़ी से एक पत्ता ना डोले। 

धीरे धीरे लोगों के ख़्यालात तो बदले लेकिन औरतों को लेकर उनके मिज़ाज में कोई बड़ी तब्दीली नही आई। हाँ, औरतों ने ख़ुद, ख़ुद को बदलने का फ़रमान ज़रूर जारी किया है। उनकी सबसे बड़ी तलवार कोई इंसानी फ़रिश्ता नहीं, बल्कि क़लम है। क़लम, जिसे थामने के लिए औरतों को छुप छुपाकर कई चीजें हासिल करनी पड़ती हैं।  

क़लम से औरतों का रिश्ता बड़ा हैरतअंगेज़ होता है। उनके हाथों में क़लम एक ऐसी तलवार का काम करती है, जिसके ज़रा सा चलने से पितृसत्ता को बड़ी गहरी चोट लगती है। चोट भी ऐसी की उसके निशान सदियों और पीढ़ियों तक रह जाते हैं। दुनिया के बनने के बाद से ही मर्दों का एक पूरा तबक़ा औरत ज़ात के ख़िलाफ़ खड़ा रहता है। इन सारी मुश्किलों के बाद भी औरतों ने अपना एक अहम मुक़ाम बनाया है। हमेशा चलने वाली इस लड़ाई में औरतों का रिश्ता क़लम से कभी दूर नहीं गया। 

अगर ग़ौर से देखा जाए तो हर घर में एक ऐसी औरत बेशक मौजूद होती है जो अपने हक़ में आवाज़ उठाने के लिए क़लम को चुनती है। जिनमें से चुनिंदा औरतें बिना हार मानें अपनी सारी बेड़ियों को तोड़कर पूरे ज़माने में शोर करती हैं। इधर-उधर से निकली ये आवाज़ें इतनी ज़ोरदार होती हैं कि इनसे पितृसत्तात्मक ख़्यालात नंगे हो जाते हैं। अक्सर ये भी देखने मिलता है के औरतों का लिखना उन तक ही सिमट कर फ़क़त शौक़ बनकर रह जाता है। हालांकि अगर पीछे मुड़ कर देखा जाए तो तारीख़ में कई ऐसी अफ़सानानिगार पेश ए ख़िदमत हुई हैं जिन्होंने बेबाक़ी से औरतों के हालात और जज़्बात को ज़ाहिर किया है। उनकी लिखावटों में मौजूद तल्खियाँ औरतों पर हो रहे ज़ुल्म ओ सितम पर  बख़ूबी उतरती हैं। बहुत ने औरतों के ख़िदमतगुज़ार रवैये और मुलायम मिज़ाज का भी विवरण दिया है। 

ऐसी इंक़लाबी अफ़सानानिगारों और शायरों में  क़ुर्रतुल ऐन हैदर, इस्मत चुग़ताई, सरोजनी नायडू, परवीन शाकिर, अमृता प्रीतम, महादेवी वर्मा जैसे नामों का शुमार सबके लबों पर होता है। आप इनमें से किसी के भी कलाम पर एक नज़र डालेंगे तो आपको उसमे एक अलग तेवर दिखेगा और साथ ही साथ कुछ कर गुज़रने का हौसला भी मिलेगा।

आग का दरिया, छुई-मुई, द गोल्डन थ्रेशहोल्ड, इंकार, रसीदी टिकट, पथ के साथी ऐसी ही संरचनाओं का संकलन है। 

आज ज़माने के जिस दौर से हम गुज़र रहे हैं वहाँ भी औरतों के हालात कुछ ख़ास नहीं बदले हैं। क़लमकारी के ज़रिए आज भी औरतें अपनी आवाज़ बुलंद करती हैं, समाज से लड़ती हैं और उनके साथ क़दम से क़दम मिलाकर चलने की हिम्मत करती हैं। अलबत्ता, ये बात कई दफ़े परेशान करती है के जो समाज औरतों को अदब और तहज़ीब के साथ ज़िन्दगी गुज़ारने का हुक्म देता है वही समाज औरतों को इस अदब से दूर रखना चाहता है। इसकी वजह सिर्फ़ यही है के, क़लमकारी से औरतों का वजूद पुर ज़ोर बोलता है और समाज की कई मज़बूत गांठें जो उन्हें रोकती हैं, उनके साथ ही फरावानी में बह उठता है। 

-सिल्विया इरशाद 

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