शायरी और मैं Urdu Bazaar

शायरी और मैं

एक शायर के विचार किसी एक वक़्त के लोगो तक महदूद नहीं रहते वो हर वक़्त के लिए कुछ ना कुछ  समेटे हुए है कुछ दिनो पहले मेरी एक जनाब से बात हो रही थी वो भी शायरी के आशिक़ थे और लिखने का हौसला रखते थे हमने वो पहली मुलाकात शेर -ओ -शायरी करते हुए बसर की, कुछ खुद के और कुछ मुकम्मल शायरों के मैने  उनसे कहा कि आपकी लिखाई मे दम है , तो उन्होने कहा साथी अच्छा हो तो सफर भी अच्छा हो जाता है मेरे मुह से वाह और दिल से अहमद फराज़ का ये शेर निकल गया,

 

          गुफ़्तुगू अच्छी लगी   

     ज़ौक़-ए-नज़र अच्छा लगा

मुद्दतों के बाद कोई हम सफर अच्छा लगा 

 

आज के इस हुक-अप कल्चर मे जहां लेफ्ट स्वाइप और राइट स्वाइप मे नतीजे आ जाते है, अहमद फराज़ के शेर आज भी दो अंजान लोगो को करीब लाने की ताकत रखते है जनाब ने मेरा शुक्रिया फरमाया, मैने उन्हे अहमद फराज़ का पता बतलाया आज हम जिस दौर मे जी रहे है उसका तसव्वुर किसी ने नहीं किया होगा लोगो से मेल - मिलाप बँध है . चाय की तपरी सुन पड़ गई है पड़ोस वाले शर्माजी के पुराने स्कूटर  की आवाज़ की जगह पंखियों के आवाज़ से नींद खुलती है. याद रखने की चीज़ों मे , चाबियों और वॉलेट के साथ अब मास्क और सेनीटाइज़र का भी इज़ाफा हो गया है एसे मे हमारी मौसी जी का फोन आया उन्होने कहा "बिटिया हमने तुम्हारी बनायी हुई बनाना ब्रेड देखी वॉटस एप स्टोरी पे केसी होती है ? हमे भी खिलाओ हम घर आते है।" उन्होने हुकम दिया मौसी हमारी बड़ी ही हिम्मत वाली है मेरे समझाने पर भी वो ना मानी. मौसी जी अब गले पड़ चुकी थी मेरे अल इज्ज़त से मना करने पर भी वो ना मानी और वॉटस एप फॉरवर्ड पढ़ के सुनाने लगी। कहनेलगी के ये वायरस कुछ नहीं है , बस हमे डराने का षड्यंत्र है उसी वक़्त मुझे बशीर बादर साहब का एक शेर याद  आया और कमाल हो गया बात मनवा भी ली और अल्फाज़ भी उधार के मैंने कहा मौसीजी , एक शेर फरमाए ? मौसीजी ने खुश होकर इरशाद कहा मैंने अर्ज़ किया ,

 

कोई हाथ भी ना मिलाएगा जो गले मिलोगे टपक से

ये नए मिज़ाज का शहर है  ज़रा फासले से मिला करो

 

मौसी जी मान तो गए मगर अम्मा से शिकायत करके बशीर साहब ने मानो इसी वक़्त के लिए ये शेर लिखा हो

 

आज तो हम घर पे बैठके बनाना ब्रैड और डालगोना कॉफी के मज़े लूट रहे हैं मगर कॉलेज के दिन याद हैं? उसमे भी में कॉलेज हॉस्टल मे रहती थी घर से हफ्ते भर के पैसे मिलते थे उसमे अगर एक दिन बाहर का कुछ खा लिया तो बचे हुए हफ्ते मेस की सूखी रोटी खानी पड़ती मगर इसका ये बिलकुल मतलब नहीं था के हम अपनी हैसियत  के बहार खर्चे ना करे दोस्तों से उधार लेकर , सबके पैसे जोड़कर भी छोटी छोटी खुशियां बाट लेते थे ये बातें सोचकर मुझे मिर्ज़ा ग़ालिब की याद आ  जाती है  कहते है ग़ालिब हमेशा कर्ज़े मे डूबे रहते थे मगर अपनी ओल्ड टॉम रम पीए बिना नहीं सोते थे उनका एक शेर है जो मेरे चेहरे पे एक बिन -कर्ज़े की हंसी छोड जाता है -

 

क़र्ज़ की पीते थे मय

लेकिन समझते थे कि हाँ

रंग लाएगी हमारी फक़ा -मस्ती एक दिन 

 

यह शेर इस मुश्किल वक़्त मे और भी सही लगता है ये हमे याद दिलाता है कि ज़िन्दगी के बुरे वक़्त मे भी खुशियां ढूंढ लेनी चाहिए, भले ही कर्ज़ की हो हमारी ज़िन्दगी एसे ही बेतरतीब किस्सो का मजमूआ' है शायरी इस ज़िन्दगी मे रंग और खुशबू भरने का काम करती है सुखन और सुकून का गहरा  नाता है इससे मुझे जौन एलिया का एक शेर याद आ गया, इस ज़िन्दगी के लिए और आपके लिए -

ज़िन्दगी एक फ़न है

लम्हों को अपने अंदाज़ से गँवाने का 

 

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