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साहित्य: क़ैद या आज़ादी Urdu Bazaar

साहित्य: क़ैद या आज़ादी

इस संसार में आये सभी मिट्टी के मूरत एक होते हैं, सब में जान होती है। सबकी अलग दशाएं होती हैं जो उनकी दिशा को तय करती है। इस मिट्टी की मूरत जिसे हम मनुष्य या इंसान कहते हैं उसका व्यक्तित्व कैसा होगा क्या होगा ये समय के साथ उसके अंदर समाया साहित्य तय करता है।  

जब यह संसार अस्तित्व में आया तब इसकी नींव साहित्य ही थी। साहित्य और संसार एक दूसरे से सम्बंधित हैं। दुनिया और साहित्य दोनों इंसान को ख़ुद में जकड़ सकती है बस फ़र्क इतना है की इंसान साहित्य या अदब में क़ैद होकर भी बेइंतहा आज़ाद हो जाता है। साहित्य का क़ैदी बना इंसान कई तरह से आज़ादी का स्वाद चखता है। सांसारिक लोभ से आज़ादी, घृणा से आज़ादी, भय, व्यक्तिगत घेरे से आज़ादी, दुनियावी लेन देन, झगड़ों और बेतुकी बातों से आज़ादी। कोई भी एक प्राण अपने जीवनकाल में जितना साहित्यक होता है, वो साहित्य का केवल एक-आध टुकड़ा होता है।  साहित्य का आयाम इतना व्यापक है कि यह किसी किताब, किसी ग्रँथ में कैद नहीं हो सकता और ना ही कोई इंसान अपने भीतर पूरा साहित्य जमा सकता है।  

जिस प्रकार हम बिना समुंद्र में उतरे हुए उसकी गहराई का अंदाज़ा नहीं लगा सकते हैं उसी प्रकार हम किसी भी ज़ुबान के साहित्य की गहराई और महानता का आंकलन उनके पन्नों को बिना पलटे नहीं लगा सकते। ऐसा कहा जाता है कि गर एक इंसान साहित्य नामक दरिया में एक बार गोता लगा लेता है तो वह उसका पाबंद हो जाता है। कई बार यह पाबंदी ज़ाहरी तौर पर दिखती है और कई दफ़े बतौर अंदरूनी बदलाव के मिलती है। कोई व्यक्ति  कैसे क्या सोचता है, उसका नज़रिया क्या है, वह चीज़ों की बारीकियों पर कितना ग़ौर करता है या उस इंसान का व्यक्तित्व, साहित्य से उसका संबध दर्शाता है।  

संसार के अस्तित्व में आने के बाद से ही कई साहित्यकारों ने अपने अपने तौर पर इससे जुड़ी कई बातें बताई हैं। शुरुआत में साहित्य के ज़्यादा स्वरूप लिपि-बद्ध नहीं हुए थे परंतु धीरे धीरे सांसारिक गति बढ़ने के फलस्वरूप इसके भी आयाम में बढ़ोतरी आयी। कुछ अदीबों और साहित्यकारों ने इसकी विशिष्ट परिभाषा भी दी है जिसके अंतर्गत कुछ श्रेणियों में पुस्तकों को बांटा जा सकता है। कुछ पुस्तकें ऐसी होती हैं, जो हमारे दिनचर्या में होने वाली घटनाओं को नए ढंग से पेश करती हैं, कुछ ऐसी जिनसे हम कुछ नया सीखते हैं और फिर कुछ ऐसी पुस्तकें हैं जो हमारे सोचने और समझने की शक्ति को निरंतर बढ़ाती रहती है। इन सब को मिलाकर या अलग अलग भी देखा जाए तो साहित्य ही वह तंत्र है जो मनुष्य को आत्मीयता का अनुभव कराता है, आत्मीयता दुनिया से हो सकती है, लोगों से हो सकती है तथा किसी स्पर्शहीन काल्पनिक विचार या भाव के लिए भी उत्पन्न हो सकती है।  

इस संसार के जितने भी सिंद्धांत हैं, व्यवहार हैं, रूप-स्वरूप हैं,दांव-पेच हैं, प्रेम-घृणा हैं, लोभ-प्रलोभ हैं सब के सब साहित्य से जुड़े होते हैं और अगर कोई इंसान इन सबको अच्छे से जीना चाहता है तो उसे साहित्य से जुड़ना पड़ता है।समय समय पर हर पीढ़ी के अनुसार, साहित्य में कुछ नया पुराना जुड़ता रहता है और हर दौर के लोगों का कारवां इससे जुड़ा रहता है। 

ग़ौरतलब है के, भारत की भूमि पर कई बड़े और महान साहित्यकार पैदा हुए हैं जिन्होंने यहां अपने बहुत गहरे छाप छोड़े हैं जिसका असर है कि यहां का हर इंसान थोड़ा या बहुत साहित्य से लगा होता है। प्रेमचंद, निराला, तुलसीदास, दिनकर, मैथली शरण गुप्ता आदि कई ने साहित्य में अपना बहुत योगदान दिया है। 

अंततः यह कहना बिल्कुल हास्यास्पद होगा कि किसी भी ज़ुबान का साहित्य हमें क़ैद करता है। यह हमें एक अलग और अद्बुध नज़रिया देता है और असल मायने में हमें रिहा करता है। 

 

-सिल्विया इरशाद

 

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