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Apna-Apna Aasman

by Sada Ambalavi
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‘अपना-अपना आस्माँ’ रिवायती और जदीद शायरी का हसीन संगम है। ग़ज़ल के मिज़ाज को बरक़रार रखते हुए उसमें बख़ूबी नये रंग भरे गये हैं। बात चाहे हुस्नो-इश्क की हो या राज़ो नियाज़ की या फिर सियासत या तसव्वुफ की, ‘सदा’ ने ग़ज़ल की पाकीज़गी पे आँच नहीं आने दी। ‘सदा’ ने उर्दू के अरूज (छन्द शास्त्र) के उसूलों को पूरी तरह से निभाते हुए मौसीक़ी की ज़रूरियात की ओर भी ख़ास तवज्जो दी है। नतीजतन शेर को पढ़ते ही गुनगुनाने को जी चाहता है और शायर के इस दावे की खुद-ब-खुद ताईद हो जाती हैः हर हर्फ़ गा रहा है, तरन्नुम में झूमकर। बरबत है ये कोई कि ‘सदा’ की बयाज़ है।

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