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Bishrampur Ka Sant

by Shrilal Shukla

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Description
'बिश्रामपुर का संत' समकालीन जीवन की ऐसी महागाथ है जिसका फलक बड़ा विस्तीर्ण है और जो एक साथ कई स्तरों पर चलती है ! एक ओर यह भूदान आन्दोलन की पृष्ठभूमि में स्वातंत्रयोत्तर भारत में सत्ता के व्याकरण और उसी क्रम में हमारी लोकतान्त्रिक त्रासदी की सूक्ष्म पड़ताल करती है, वहीँ दूसरी ओर एक भूतपूर्व ताल्लुकेदार और राज्यपाल कुँवर जयतिप्रसाद सिंह की अंतर्कथा के रूप में महत्वाकांक्षा, आत्मछल, अतृप्ति, कुंठा आदि की जकड में उलझी हुई जिंदगी को पर्त-दर-पर्त खोलती है ! फिर भी इसमें सामंती प्रविर्तियो की हसोंमुखी कथा-भर नहीं है, उसी के बहाने जीवन में सार्थकता के तंतुओ की खोज के सशक्त संकेत भी है! यह और बात है कि कथा में एक अप्रत्याशित मोड़ के कारन, जैसा कि प्रायः होता है, यह खोज अधूरी रह जाती है! 'राग दरबारी' के सुप्रसिद्ध लेखक श्रीलाल शुक्ल की यह नवीनतम कृति, कई आलोचकों की निगाह में उनका सर्वोत्तम उपन्यास है!