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Chanakya

by Bhagwaticharan Verma
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चाणक्य सुविख्यात उपन्यासकार भगवतीचरण वर्मा की अन्तिम कथाकृति है । मगध-सम्राट महापदम नन्द और उसके पुत्रों द्वारा प्रजा पर जो अत्याचार किए जा रहे थे, राज्यसभा में आचार्य विष्णुगुप्त ने उनकी कडी आलोचना की; फलस्वरूप नन्द के हाथों उन्हें अपमानित होना पडा । विष्णुगुप्त का यही अपमान अन्तत: उस महाभियान का आरम्भ सिख हुआ, जिससे एक और तो आचार्य विष्णुगुप्त 'चाणक्य' के नाम से विख्यात हुए और दूसरी ओर मगध-साम्राज्य को चन्द्रगुप्त-जैसा वास्तविक उत्तराधिकारी प्राप्त हुआ । भगवती बाबू ने इस उपन्यास में इसी ऐतिहासिक कथा की परतें उधाडी हैं । लेकिन इस क्रम में उनकी दृष्टि एक पतनोन्मुख राज्य-व्यवस्था के वेभव-विलास और उसकी उन विकृतियों का उद्घाटन करती है जो उसे मूल्य-स्तर पर खोखला बनाती हैं और काल-व्यवधान से परे आज भी उसी तरह प्रासंगिक हैं । इस उपन्यास की प्रमुख विशेषता यह भी है कि चाणक्य यहाँ पहली बर अपनी समग्रता में चित्रित हुए हैं । उनके कठोर और अभेद्य व्यक्तित्व के भीतर भगवती बाबू ने नवनीत-खंड की भी तलाश की है । अपने महान जीवन-संघर्ष में स्वाभिमानी, संकल्पशील, दूरद्रष्टा और अप्रतिम कूटनीतिज्ञ के साथ-साथ वे एक सुहृद प्रेमी और सदगृहस्थ के रूप में भी हमारे सामने आते हैं । निश्चय ही, 'चित्रलेखा' और 'युवराज चुंडा' जैसे ऐतिहासिक उपन्यासों के क्रम में लेखक की यह कृति भी स्मरणीय है ।