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Dasht Mein Dariya

by Sheen Kaaf Nizam
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निजाम साहब का काव्य मैंने पढ़ा भी है उनके गहन-गंभीर स्वर में सुना भी और इस अनुभव से बार-बार आप्यायित हुआ हूँ ! निजाम साहब की कविताएँ मुझे सबसे पहले इसीलिए आकृष्ट करती हैं कि वे भारतीय रचनाये हैं ! जिस संवेदन संसार में वे हमें आमंत्रित करती हैं वह हमारा जाना-पहचाना हैं और उसमें वह बड़ी सहजता से प्रवेश करते हैं ! फिर जो देश-काल उनकी रचनाओं में गूंजता है वह भी हाम्र अपना सुपरिचित देश-काल हैं ! हमें अपने को यह याद नहीं दिलाना पड़ता कि हम किसी सुन्दर मगर पराये बगीचे में झाँक रहे हैं ! निजाम साहब के काव्य में एक और बात मुझे विशेष आकृष्ट करती है; वह है उसमें भावना और विचार का विलक्षण सामंजस्य ! निजाम दूर की कौड़ी लाने वाले या उडती चिड़िया के पर काटने वाले शायर नहीं हैं ! चमत्कारी बात उनकी अभीष्ट नहीं है ! सीधा-साधा मानवीय सत्य कितना बड़ा चमत्कार होता है यह वह जानते हैं, और उसी को अपने भीतर से पाना, उसी को दूसरे के भीतर उतार देना उनका अभीष्ट है ! गजल के स्वाभाव में ही यह चीज है कि उसका एक-एक शेर विचार अथवा भाव वास्तु की दृष्टि से एक मुक्तक होता है : लय अथवा तुक इन मुक्तकों को श्रृंखलित करती चलती है ! विचारों अथवा भावो के जगत में मुक्त आसंगों की-सी एक निरायास यात्रा होती रहे इस उद्देश्य की पूर्ति निजाम की गजलें भी बखूबी करती हैं ! कभी-कभी तो एक हे शेर पढ़कर पाठक गहरे में छुआ जाकर देर टार वहीँ निःस्तब्ध रुका रह सकता है-गजल इसकी छूट देती है ! मेरा विश्वास है कि निजाम साहब का यह संग्रह हिंदी जगत में दूर-दूर तक पढ़ा जाएगा और सम्मान पायेगा; इतना ही नहीं, वह एक बहुत बड़े पाठक वर्ग का अपना हो जाएगा; अपना, आत्मीय और सखावत सहज आनंद देने वाला !