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Dastangoi

by Mahmood Farooqui
Original price ₹ 250.00
Current price ₹ 225.00
Binding
Product Description

Dastaan ​​is a spoken statement which Dastango, who introduced it, used to be expert in the language, statements, shayari and installment. Many stories have been heard, but the most famous among them is Dastane Amir Hamza, which narrates the life of Hazrat Mohammad Sa's uncle Amir Hamza and his magnificent exploits. In the 18th and 19th centuries, when this story was established in Urdu, it produced a wonderful combination of admiration and offering and many things were added to it which were of the Indian Hindustani mood, such as Tilism and Iyer which later proved to be the most important part of Dastangoi. Occurred. Emperor Hamza, who appeared on the characters of the uncountable variety, Sayyar Sultanates, Tilism, Magician, Dev, Iyar, and Ayyarya, finally appeared in 46 Jakhim Bindals and proved to be mine of Urdu adab and Hindustani funeon latifa. The time of Dastangoi in both Jabani and Tahiri forces reached its Uruj almost immediately, with the influx of new moods and new media, it was also speeded up. The last Dastango Mir Bakar Ali came to life in 1928, and with this the Ajmi Ravayat was lost.

 

दास्तान जबानी बयानिया है जिसे पेश करने वाले दास्तानगो जबान, बयान, शायरी और किस्त के माहिर होते थे। दास्तानें बहुत-सी सुनाई गई पर इनमें सबसे मशहूर हुई दास्ताने अमीर हमज़ा जिनमें हजरत मोहम्मद सः के चचा अमीर हमज़ा की जिन्दगी और उनके शानदार कारनामों को बयान किया जाता है। 18वीं और 19वीं सदी में जब ये दास्तान उर्दू में मकबूल हुई तो इससे अदब और पेशकश का बेहतरीन मेल पैदा हुआ और इनमें कई ऐसी बातों का इजाफा हुआ जो खालिस हिन्दुस्तानी मिज़ाज़ की थीं मसलन, तिलिस्म और अय्यारी जो बाद में दास्तानगोई का सबसे अहम हिस्सा साबित हुईं। बेशुमार क़िस्म के जानदार, सय्यारे सल्तनतें, तिलिस्म, जादूगर, देव, अय्यार, और अय्यारायें जैसे किरदारों पर मुश्तमिल दास्ताने अमीर हमज़ा आखिरकार 46 जख़ीम जिल्दों में पूरी होकर छपी और उर्दू अदब और हिन्दुस्तानी फनूने लतीफा का मेराज साबित हुई। दास्तानगोई का फन जबानी और तहरीरी दोनों शक्लों में जिस वक्त अपने उरूज पर पहुँचा तकरीबन उसी वक्त नए मिजाज और नए मीडिया की आमद के साथ बड़ी तेजी से इसका जवाल भी हुआ। आखि़री दास्तानगो मीर बाकर अली का इन्तकाल 1928 में हुआ और इसके साथ ही ये अजमी रवायत नापैद हो गई।