Skip to content

Ek Thag Ki Dastan

by Philip Meadows Taylor
Original price Rs 395.00
Current price Rs 356.00
Add Rs 500.00 or more in your cart to get Free Delivery
Free Reading Points on every order
Binding
Product Description
700 से अधिक हत्याएँ करके अपराध के महासिन्धु में डूबा हुआ अमीर अली जेल में सामान्य बन्दियों से पृथक् बड़े ठाट-बाट से रहता था। वह साफ कपड़े पहनता, अपनी दाढ़ी सँवारता और पाँचों वक्त की नमाज अदा करता था। उसकी दैनिक क्रियाएँ नियमपूर्वक चलती थीं। अपराधबोध अथवा पश्चात्ताप का कोई चिद्द उसके मुख पर कभी नहीं देखा गया। उसे भवानी की अनुकम्पा और शकुनों पर अटूट विश्वास था। एक प्रश्न के उत्तर में उसने कहा था कि भवानी स्वयं उसका शिकार उसके हाथों में दे देती है, इसमें उसका क्या कसूर? और अल्लाह की मर्जी के बिना एक पत्ता भी नहीं हिल सकता। उसका यह भी कहना था कि यदि वह जेल में न होता तो उसके द्वारा शिकार हुए यात्रियों की संख्या हजार से अधिक हो सकती थी। प्रस्तुत पुस्तक ‘एक ठग की दास्तान’ 19वीं शताब्दी के आरम्भकाल में मध्य भारत, महाराष्ट्र तथा निजाम के समस्त इलाकों में सड़क-मार्ग से यात्रा करनेवाले यात्रियों के लिए आतंक का पर्याय बने ठगों में सर्वाधिक प्रसिद्ध अमीर अली के विभिन्न रोमांचकारी अभियानों की तथ्यपरक आत्मकथा है। इसे लेखक ने स्वयं जेल में अमीर अली के मुख से सुनकर लिपिबद्ध किया है। औपन्यासिक शैली में प्रस्तुत अत्यधिक मनोरंजक आत्मकथात्मक पुस्तक।

Customer Reviews

Based on 2 reviews
100%
(2)
0%
(0)
0%
(0)
0%
(0)
0%
(0)
M
M.S.

बहतरीन अनुवाद।
पुस्तक का दाम ज्यादा रखा गया है।अंग्रेजी संस्करण अमेजन और फ्लिप्कार्ट पर बहुत सस्ता।
अमीर अली के कारनामे हृदय विदारक।मगर पढते हुए लगा कि उसने लाग लपेट ना करके दिल खोल दिया।उस समय के भारत की तस्वीर उकेरी गयी है।सामाजिक हालात बहुत खराब रहे होँगे।अपने सैय्यद होने के दर्प को कहीं नहीं छिपाया।हिन्दुओं की मांग और ढ़ोर जातियों की हीन अवस्था का वर्णन करना और खुद दुर्दांत अपराधी होते हुए इन जातियों को जन्मजात क्रिमिनल कास्ट घोषित करना अतीव दु:ख का विषय।
तत्कालीन जालौन का राजा अवश्य ही मराठा उच्च वर्ण का हिन्दू रहे होँगे। लगता नहीं है कि इतने गिरे हुए होँगे।सच है कि लम्बे समय से निम्न वर्ग के हिन्दुओं का शोषण बुंदेलखंड में होता रहा हो मगर ठग ब्राह्मण भी होते थे जिसके कई उदहारण पुस्तक में दिये हैं और एक ठग का उच्च वर्ण के हिन्दू होने का दर्प और जन्म जनमान्तर के सुकर्मों के फलस्वरुप उच्च वर्ण में पैदा होने का प्रिविलेज बहुत कुछ कह जाता है।अन्ग्रेज कम्पनी बहादुर के सामने तो तत्कालींन राजे महराजे क्या दुर्दांत अपराधी भी घुटनो पर झुके दिखाये गये हैं।अमीर अली के मुंह से अन्ग्रेज लेखक टेलर ने जानबूझ कर कहलवाया प्रतीत होता है।टेलर महोदय क्यों नहीं कुछ दशक बाद (1857) के भारतीयों के स्वतंत्रता संग्राम के दौर के भारत का जिक्र करते ?
अन्धविश्वास तो तत्कालीन सारे भारतीयों में रहा होगा।पढे लिखे लोगों की संख्या ही कितनी थी- स्त्री और शूद्र तो ग्रामीण/ कस्बों में शिक्षा ले ही नहीं सकते थे।झांसी के शासक महाराष्ट्रीय ब्राह्मण थे और ऐसा नहीं लगता कि उन्होने कभी शिक्षा प्रसार के लिये कुछ प्रयास किये हों!!
होल्कर, सिंधिया, भोंसले मराठा राजे थे।पेशवा, निज़ाम अन्ग्रेज कम्पनी बहादुर से subsidiary alliance कर के चुप लगा कर बेठ गये, anarchy का बोलबाला था, पुलिस तंत्र बर्बाद हो चुका था, पिन्डारी निर्बाध लूटपाट कर रहे थे।टेलर साहब अमीर अली के मुंह से भारतीयों को रिश्वतखोर, लालची, अकर्मण्य बताने को उतावले दिखाई देते हैं- कभी उन्होने अंग्रेजों में व्याप्त बुराईयों का Bernard Cornwell या अन्य लेखको की तरह जिक्र भी किया हो!

Y
Y.K.

Ek Thag Ki Dastan