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FAISLA

by Pardeshiram Verma
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छत्तीसगढ़ अंचल के जीवन राग और अन्तःसंघर्ष को प्रतिबिम्बित करती परदेशीराम वर्मा की हिन्दी कहानियाँ विषय और अनोखे कथाप्रसंगों के साथ ही सरल प्रस्तुति के कारण चर्चित हुईं। सतत विस्तार की ओर अग्रसर लाल गलियारे के कारण खौफजदा आदिवासियों की कहानियाँ इस संकलन को नया आयाम देती हैं। साथ ही खंडित होती आस्था और टूट रहे सामाजिक सम्बन्धों पर केन्द्रित इस संग्रह की कहानियाँ इस अंचल की सीमाओं का अतिक्रमण भी करती हैं। विकास की ओर अग्रसर देश और प्रदेश के लोग निजता और सुकून की कीमत पर मिल रही उपलब्धियों को अपनी हार और चन्द मुट्ठी भर विस्तारवादी लोगों की जीत की तरह स्वीकारने हेतु विवश हैं। आक्रामक एवं विस्तारवादी कारखानेदारों की संवेदनहीन उद्योग दृष्टि से संचालित योजनाओं ने गाँवों के आसमान को धुएँ और खेतों की धूल से ढँक सा दिया है। फिर भी मर-मर के जीते हुए और इस घेरेबन्दी से निकलकर साँस लेने में कामयाब ग्रामीणजन नयी पीढ़ी के लिए गाँवों को गाँव की तरह बचा लेने हेतु इन कहानियों में संकल्पित दिखते हैं। इस संग्रह की कहानियाँ समकालीन परिदृश्य को भयावह सर्पकाल के रूप में चित्रित करती हैं। ये कहानियाँ बताती हैं कि धर्म, जाति और स्थानीयता के नकली मसलों में उलझाकर मनुष्यता के पारम्परिक स्वरूप को विरूपित करने वाली ताकतें अब और अधिक प्रवीण, साधन सम्पन्न और मायावी हो गयी हैं। विलक्षण भाषा कौशल और दुर्लभ कथ्य के साथ ही प्रस्तुति में सादगी और सधाव संग्रह की कहानियों की विशेषता है।

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