-10%

Goli

Aacharya Chatursen (Author)

Rs 180.00 – Rs 405.00

HardcoverHardcover
PaperbackPaperback
Rs 450.00 Rs 405.00
Description

मैं घबरा रही थी कि न जाने माँ क्या कहेगी । क्या पूछेगी । परंतु वे सब बातें उसे मैं कैसे बताऊंगी! कैसे कहूंगी! माँ ने मुझे देखकर कुछ नहीं कहा । न कुछ पूछा । उसने एक विचित्र दृष्टि से मेरी ओर देखा । उसके होंठों पर एक मीठी स्मित रेखा और नेत्रों में संतोष की झलक थी । उसकी उस दृष्टि को देख मैं कुछ ऐसी लजाई कि दौड़कर मैंने उसकी गोद में अपना मुंह छिपा लिया । माँ ने मेरे सिर पर दोनों हाथ रखकर मुझे अपनी छाती से लगा लिया । ऐसा प्यार और संरक्षण मैंने कभी आज से प्रथम माँ से नहीं पाया था । बड़ी देर तक मैं उसी तरह माँ के वक्ष में मुंह छिपाए खड़ी रही । जब मैंने मुंह उठाया तब देखा, माँ का मुंह आंसुओं से भीगा हुआ है । उसने आहिस्ता से मुझे अपने वक्ष से अलग किया और कहा, ‘‘अन्नदाता ने पसाव भेजा है ।’’ सुनकर मैंने माँ के मुंह की ओर देखा । मैंने देखा उसकी दृष्टि सामने चैकी पर रखे, पीले कपड़े से ढांपे हुए एक बड़े–से–ढेर पर लगी है । मैंने भी उसी ओर नज़र उठाई । कौतूहल और उत्सुकता से मैंने जाकर उस ढेर का वस्त्र हटाया । देखकर मेरी आंखें चैंधिया गर्इं । एक भारी जोड़ा थो, जैसा कुंवरी पहनती थीं । कुछ जड़ाऊ गहने थे । ढेर सोने की मुहरें थीं । मिठाई और मेवे के थाल थे । ये सब इतनी चीज़ें किसके लिए आई हैं ?मैंने माँ से आंखों–ही–आंखों में प्रश्न किया । माँ ने अभिप्राय समझकर, मुस्कराकर कहा, ‘‘यह महाराज श्री ने तेरे लिए पसाव भेजा है ।’’ ‘‘मेरे लिए ?’’ मेरे मुंह से टूटे–फूटे शब्द निकले । आंखें फाड़–फाड़कर मैं उन सब चीज़ों को देखने लगी । अपने जीवन में मैंने इतनी चीजें कभी नहीं देखी थीं । वे सब क्या मेरे लिए हैं, मेरे लिए! मैं आनंद से विह्वल हो गई । मेरा कलेजा उछलने लगा और मैंने परेशान होकर माँ की ओर देखा । माँ ने कहा, ‘‘वह जोड़ा पहन ।’’ -इसी पुस्तक से

Additional Information
Binding

Hardcover, Paperback