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Harijan Se Dalit

by RAJ KISHORE
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'हरिजन' एक सुन्दर शब्द है। इस पर गाँधी जी के व्यक्तित्व की मिठास की छाप है। लेकिन आज कोई गाँधी नहीं है। अतः 'हरिजन' शब्द का अर्थ भी तिरोहित हो चुका है। गाँधी जी भी नहीं चाहते होंगे कि कोई हरिजन आजीवन हरिजन ही बना रहे। गाँधी के विरुद्ध आक्रोश व्यक्त करने पर कांग्रेस के लोगों और गाँधीवादियों को तकलीफ़ होती है, किन्तु समाज में कोई हरिजन न रह जाए, इसके लिए उन्होंने किया क्या है? वस्तुतः यह आक्रोश गाँधी के प्रति कम, गाँधी के अनुयायियों के प्रति ज़्यादा है। जब कोई दलित गुस्से में आता है तो, वह सवर्ण समाज के सभी मिथकों और देवी-देवताओं को ध्वस्त कर देना चाहता है। यदि भारत का सवर्ण गाँधी को सिर्फ़ अपना देवता नहीं मानता, बल्कि मौजूदा अन्धकार में प्रकाश स्तम्भ समझता है, तो उसे हरिजनों को ऊपर लाने के लिए जी-जान से कूद पड़ना चाहिए। प्रेम की परीक्षा कर्म से ही होती है। वैसे भी समाज के किसी खास वर्ग के लिए कोई स्थायी नामकरण नहीं होना चाहिए। इस दृष्टि से हरिजन और दलित, दोनों निरर्थक शब्द हैं। हरिजन प्रेम और दलित संघर्ष दोनों की श्रेष्ठ परिणति यही होगी कि ये शब्द हमारे कोश से क्रमशः बाहर होते जाएँ। जाति प्रथा बनानेवालों ने सोचा होगा कि वे कुछ शाश्वत कोटियों की रचना कर रहे हैं। उन्हें सम्पूर्ण रूप से पराजित करने से बड़ा सामाजिक सुख इस समय भारत में क्या हो सकता है?

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