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Hindi Ke Aanchalik Upanyason Mein MulyaSankraman

by DR. VEDPRAKASH AMITABH
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बीसवीं शती के छठे-सातवें दशक में ‘आँचलिकता’ एक विस्फोट के तौर पर उभरी थी और समूचा औपन्यासिक परिदृश्य उसकी ऊर्जा की कौंध से दीप्त हो गया था। शुरू से ही आँचलिक उपन्यासों के मूल्यांकन के दो विरोधी छोर रहे हैं। किन्तु प्रशंसा और निन्दा के अतिरेक के मध्य वस्तुनिष्ठ-संतुलित समीक्षा दृष्टि ही विश्वसनीय ठहराती है। वेदप्रकाश अमिताभ का यह समीक्षात्मक प्रयास आँचलिक उपन्यासों के प्रति किसी आग्रही दृष्टिकोण या निषेध-दृष्टि से प्रेरित-पोषित नहीं है। आँचलिक उपन्यासों की उपलब्धियोंµविशेषतः अपने संक्रमणशील परिवेश का साक्ष्य बनने की शक्ति का इसमें उद्घाटन हुआ है। लेकिन इस कृति में समीक्षा-कर्म केवल उपलब्धि या विशेषता को रेखांकित करने तक सीमित नहीं है, आँचलिक उपन्यास के समग्र सोच की सीमाएँ भी उभर कर सामने आयी हैं। यह कृति न केवल आँचलिक उपन्यासों के अभिप्राय से सीधा संवाद करती है, अपितु उसकी प्रासंगिकता का निर्धारण भी करती है। आँचलिक उपन्यासों के अध्येताओं और पाठकों को यह समीक्षा-कृति कुछ ‘अभिनव’ और ‘विचारोत्तेजक’ सामग्री देने में सक्षम है।

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