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Jal Thal Mal

by Sopan Joshi
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शौचालय का होना या न होना भर इस किताब का विषय नहीं है | यह तो केवल एक छोटी सी कड़ी है, शुचिता के तिकोने विचार में | इस त्रिकोण का अगर एक कोना है पानी, तो दूसरा है मिटटी, और तीसरा है हमारा शरीर | जल, थल और मल | पृथ्वी को बचाने की बात तो एकदम नहीं है | मनुष्य की जात को खुद अपने को बचाना है, अपने आप ही से | पुराना किस्सा बताता है की समुद्र मंथन से विष भी निकलता है और अमृत भी | यह धरती पर भी लागू होता है | हमारा मल या तो विष का रूप ले सकता है या अमृत का | इसका परिणाम किसी सरकार या राजनीतिक पार्टी या किसी नगर की नीति-अनीति से तय नहीं होगा | तय होगा तो हमारे समाज के मन की सफाई से | जल, थल और मल के संतुलन से |