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Kahat Kabeer

by Harishankar Parsai
Original price Rs 175.00
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Binding
  • Language: Hindi
  • Pages: 164
  • ISBN: 9788126728534
  • Category: Humorous
हरिशंकर परसाई के व्यंग्य को श्रेष्ठतम इसलिए कहा जाता है कि उनका उददेश्य कभी पाठक को हँसाना भी नहीं रहा । न उन्होंने हवाई कहानियां बनीं, न ही तथ्यहीन विद्रूप का सहारा लिया । अपने दौर की राजनितिक उठापठक को भी वे उतनी ही जिम्मेदारी और नजदीकी से देखते थे जैसे साहित्यकार होने के नाते आदमी के चरित्र को । यही वजह है कि समाचार-पत्रों में उनके स्तंभों को भी उतने ही भरोसे के साथ, बहैसियत एक राजनितिक टिप्पणी पढ़ा जाता था जितने उम्मीद के साथ उनके अन्य व्यग्य-निबंधो को । इस पुस्तक में उनके चर्चित स्तम्भ 'सुनो भई साधो' में प्रकाशित 1983-84 के दौर की टिप्पणियां शामिल हैं । यह वह दौर था जब देश खालिस्तानी आतंकवाद से जूझ रहा था । ये टिप्पणियां उस पुरे दौर पर एक अलग कोण से प्रकाश डालती हैं, साथ ही अन्य कई राजनितिक और सामाजिक घटनाओं का उल्लेख भी इनमें होता है । जहीर है खास परसाई-अंदाज में । मसलन, 21 नवम्बर, 83 को प्रकाशित 'चर्बी, गंगाजल और एकात्मता यज्ञ' शीर्षक लेख की ये पंक्तियाँ । "काइयां सांप्रदायिक राजनेता जानते हैं कि इस देश का मूढ़ आदमी न अर्थनीति समझता, न योजना, न विज्ञान, न तकनीक, न विदेश नीति । वह समझता है गौमाता, गौहत्या, चर्बी, गंगाजल, यज्ञ । वह मध्ययुग में जीता है और आधुनिक लोकतंत्र में आधुनिक कार्यकर्म पर वोट देता है । इस असंख्य मूढ़ मध्ययुगीन जान पर राज करना है तो इसे आधुनिक मत होने दो ।"