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Mahaveer Prasad Dwivedi Aur Hindi Navjagaran

by Ram Vilas Sharma

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Description

Author: Ram Vilas Sharma

Languages: Hindi

Number Of Pages: 405

Binding: Hardcover

Package Dimensions: 8.7 x 5.7 x 1.0 inches

Release Date: 01-01-2016

Details: Product Description द्विवेदी जी ने अपने साहित्यिक जीवन में सबसे पहले अर्थशास्त्र का गहन अध्ययन किया और बड़ी मेहनत से 'संपत्ति शास्त्र' नामक पुस्तक लिखी | इसीलिए द्विवेदी जी बहुत-से ऐसे विषयों पर टिप्पणियाँ लिख सके जो विशुद्ध साहित्य की सीमाएँ लाँघ जाति हैं | इसके साथ उन्होंने राजनीतिक विषयों का अध्ययन किया और संसार में हो रही राजनीतिक घटनाओं पर लेख लिखे | राजनीति और अर्थशास्त्र के साथ उन्होंने आधुनिक विज्ञानं से परिचय प्राप्त किया और इतिहास तथा समाजशास्त्र का अध्ययन गहराई से किया | इसके साथ भारत के प्राचीन दर्शन और विज्ञानं की ओर ध्यान दिया और यह जानने का प्रयत्न किया कि हम अपने चिंतन में कहाँ आगे बढे और कहाँ पिछड़े हैं | परिणाम यह हुआ कि हिंदी प्रदेश में नवीन सामाजिक चेतना के प्रसार के लिए वह सबसे उपयुक्त व्यक्ति सिद्ध हुए | उनके कार्य का मूल्याङ्कन व्यापक हिंदी नवजागरण के सन्दर्भ में ही संभव है | डॉ. रामविलास शर्मा द्वारा रचित इस कालजयी पुस्तक के पांच भाग हैं | पहले भाग में भारत और साम्राज्यवाद के सम्बन्ध में द्विवेदी जी ने और 'सरस्वती' के लेखकों ने जो कुछ कहा है, उसका विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है | दूसरे भाग में रूढ़ीवाद से संघर्ष, वैज्ञानिक चेतना के प्रसार और प्राचीन दार्शनिक चिंतन के मूल्याङ्कन का विवेचन है | तीसरे भाग में भाषा-समस्या को लेकर द्विवेदी जी ने जो कुछ लिखा है, उसकी छानबीन की गई है | चौथे भाग में साहित्य-सम्बन्धी आलोचना का परिचय दिया गया है | पांचवे भाग में द्विवेदी-युग के साहित्य की कुछ विशेषताओं की ओर संकेत किया गया है | बहुत-सी समस्याएँ जो द्विवेदी जी के समय में थीं, आज भी विद्यमान हैं | इसीलिए आज के संदर्भ में भी इस पुस्तक की सार्थकता और उपयोगिता अक्षुण्ण है | About the Author डाॅ. रामविलास शर्मा जिला उन्नाव के एक छोटे-से ग्राम ऊँचगाँव सानी में 10 अक्तूबर सन् 1912 को जन्म हुआ। लखनऊ विश्वविद्यालय से 1932 में बी.ए. तथा 1934 में अंग्रेजश्ी साहित्य में एम.ए. परीक्षा उत्तीर्ण की। इसी बीच महाकवि निराला से परिचय हुआ और उसकी परिणति आत्मीयता में हुई। एम.ए. करने के पश्चात 1938 तक शोधकार्य में व्यस्त रहे। शोध की पूर्णता के पश्चात् लखनऊ विश्वविद्यालय के अंग्रेजश्ी विभाग के अध्यक्ष रहे। बाद में आगरा विश्वविद्यालय के कुलपति के अनुरोध पर के.एम. हिन्दी संस्थान के निदेशक का कार्यभार स्वीकार किया और 1974 में अवकाश लिया। देशभक्ति तथा माक्र्सवादी चेतना रामविलास जी की आलोचना की केन्द्र-बिन्दु है। उनकी लेखनी से वाल्मीकि तथा कालिदास से लेकर मुक्तिबोध तक की रचनाओं का मूल्यांकन प्रगतिवादी चेतना के आधार हुआ। उन्हें न केवल प्रगति-विरोधी हिन्दी-आलोचना की कला एवं साहित्य-विषयक भ्रान्तियों के निवारण का श्रेय है, वरन् स्वयं प्रगतिवादी आलोचना द्वारा उत्पन्न अन्तर्विरोधों के उन्मूलन का गौरव भी प्राप्त है। सन् 1949 से 1953 तक रामविलास जी अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ के महामंत्राी रहे। रामविलास जी ने हिन्दी में जीवनी-साहित्य को नये आयाम दिये हैं, और वैज्ञानिक दृष्टि से विश्लेषित करने तथा हिन्दी आलोचना को वैज्ञानिक दृष्टि प्रदान करने का श्रेय प्राप्त है। सम्मान: केन्द्रीय साहित्य अकादेमी का पुरस्कार तथा हिन्दी अकादेमी, दिल्ली का शताब्दी सम्मान। देहावसान: 30 मई, 2000।