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Manto : Ek Badnam Lekhak

by Vinod Bhatt
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Binding
उर्दू साहित्य में मंटो ही सबसे ज्यादा बदनाम लेखक है | सबसे बड़ा गुनाह यह कि वह समय से पिचहत्तर साल पहले पैदा हुआ | साथ ही उसने समय से पहले मर कर हिसाब बराबर कर दिया | उस समय उसने जो कुछ लिखा, वह अगर आज लिखा होता तो उसकी एक भी कहानी पर अश्लीलता का मुकदमा नहीं चला होता | उसमें भरपूर आत्मविश्वास था | वो जो कुछ भी लिखता, जैसे सुप्रीम कोर्ट का आखिरी फैसला ! कोई चुनौती दे तो वो सुना देता | उसकी कहानियों में वेश्याओं के दलाल पात्रों के वर्णन के बारे में किसी ने मंटो से कहा - रेडियों के दलाल जैसे आप बनाते है, वैसे नहीं होते | मंटो ने तीक्ष्ण दृष्टि से देखते हुए कहा-वो दलाल खुशिया में हूँ |...और यह जानकर हिंदी के प्रसिद्द कथाकार देवेन्द्र सत्यार्थी ने निःश्वास छोड़ते हुए कहा-काश में खुशिया होता....| मंटो की निजी पसंद-नापसंद अत्यंत तीव्र होती थी | मृत व्यक्ति की बस तारीफ ही की जानी चाहिए-मंटो ऐसा नहीं मानता था | उसका एक विचार-प्रेरक कथन है-ऐसी दुनिया, ऐसे समाज पर मैं हजार-हजार लानत भेजता हूँ, जहाँ ऐसी प्रथा है कि मरने के बाद हर व्यक्ति का चरित्र और उसका व्यक्तित्व लांड्री में भेजा जाए, जहाँ से धुलकर, साफ़-सुथरा होकर वह बाहर आत है और उसे फरिश्तों की कतार में खूंटी पर टांग दिया जाता है |