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Mantrimandal

by Rajkrishan Mishra
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उस दिन राजभवन में, मंत्रिमंडल के शपथ ग्रहण में, केवल तीन मंत्री बन पाये थे, स्वयं उत्सुकदास, दूसरे लोबीराम और तीसरे थे भीमसिंह उत्सुकदास का मन बड़ा उदास था... मुख्यमंत्री उत्सुकदास जिलाधिकारी फैज़ाबाद को बाबरी मस्जिद उर्फ़ राममंदिर का ताला खुलवाने का आदेश देकर चले गए, लेकिन...मौनी बाबा की आँखें बंद थीं। उत्सुकदास बोले, 'बाबा, यद्यपि मुझे मुख्यमंत्री बना दिया गया है, मेरे किसी आदमी को मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया गया है। यहाँ तक कि मेरे विशेष राजनैतिक शिष्य को मंत्री बनाना तो दूर रहा, पार्टी से निलम्बित होने तक से मैं नहीं रोक सका...” भारतीय राजनीति को अपने मौन के चलते कहाँ से कहाँ पहुँचा दिया है इन मौनी बाबाओं ने! राजनीतिक उपन्यासों के लेखन में सिद्धहस्त राजकृष्ण मिश्र के इस नये उपन्यास में एक प्रदेश के बहाने पूरे भारत राष्ट्र की राजनीतिक दशा-दुर्दशा को बेनकाब किया गया है। लेखक का दावा है कि उनके राजनीतिक उपन्यासों के इन तीन खंडों (काउंसिल हाउस, दारुलशफ़ा और मंत्रिमंडल) को पढ़ने के बाद, पढ़नेवाला वह व्यक्ति नहीं रहेगा, जो वह पहले था।

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