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Description
महाकवि ‘निराला’ की युगांतरकारी कविताओं का अति विशिष्ट और सुविख्यात संग्रह है-परिमल! इसी में है तुम और मैं, तरंगो के प्रति, ध्वनि, विधवा,भिक्षुक,संध्या-सुन्दरी, जूही की कलि, बदल-राग, जागो फिर एक बार-जैसी श्रेष्ठ कविताएँ, जो समय के वृक्ष पर अपनी अमिट लकीर खिंच चुकी हैं! परिमल में छाया-युग और प्रगति-युग अपनी सीमाएँ भूलकर मनो परस्पर एकाकार हो गए हैं! इसमें दो-दो काव्य-युगों की गंगा-जमनी छटा है, दो-दो भावधाराओं का सहज्मुक्त विलास है!
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Hardcover