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Patrangpur Puran

by Mrinal Pande
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रचनात्मक गद्य की गहराई और पत्रकारिता की सहज सम्प्रेषणीयता से समृद्ध मृणाल पांडे की कथाकृतियाँ हिंदी जगत में अपने अलग तेवर के लिए जनि जाती हैं ! उनकी रचनाओ में कथा का प्रवाह और शैली उनका कथ्य स्वयं बुनता है ! ‘पटरंगपुर पुराण’ के केंद्र में पटरंगपुर नाम का एक गाँव है जो बाद में एक कसबे में तब्दील हो जाता है ! इसी गाँव के विकास-क्रम के साथ चलते हुए यह उपन्यास कुमायूं-गढ़वाल के पहाड़ी क्षेत्र के जीवन में पीढ़ी-दर-पीढ़ी आए बदलाव का अंकन करता है ! कथा-रस का सफलतापूर्वक निर्वाह करते हुए इसमें कलि कुमायूं के राजा से लेकर भारत को स्वतंत्रता-प्राप्ति तक के समय को लिया गया है ! परिनिष्ठित हिंदी के साथ-साथ पहाड़ी शब्दों और कथन-शैलियों का उपयोग इस उपन्यास को विशेष रूप से आकर्षित बनता है, इसे पढ़ते हुए हम न केवल सम्बंधित क्षेत्र के लोक-प्रचलित इतिहास से अवगत होते हैं, बल्कि भाषा के माध्यम से वहां का जीवन भी अपनी तमाम सांस्कृतिक और सामाजिक भंगिमाओं के साथ हमारे सामने साकार हो उठता है ! कहानियों-किस्सों की चलती-फिरती खां, विष्णुकुटी की आमा की बोली में उतरी यह कथा सचमुच एक पुराण जैसी ही है !