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Prarambhik Awadhi

by Vishwanath Tripathi
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जिन रचनाओं के आधार पर प्रस्तुत अध्ययन किया गया है वे मोटे तौर पर 1000 ई. से लेकर 1600 ई. तक की हैं। राउरबेल का रचनाकाल 11वीं शती है। इसलिए यदि राउरबेल के प्रथम नखशिख की भाषा को, जिसमें अवधी के पूर्व रूपों की स्थिति मानी गई है, भाषा का प्रतिनिधि मान लिया जाए जिससे अवधी विकसित हुई तो अनुचित नहीं होगा। इस पुस्तक में 'अवधी की निकटतम पूर्वजा भाषा’ नामक अध्याय में प्राकृत पैंगलम् के छन्दों, राउरबेल और उक्तिव्यक्तिप्रकरण में से ऐसे रूपों को ढूँढऩे का प्रयास है जो अवधी में मिलते हैं या जिनका विकास उस भाषा में हुआ है। अगले अध्याय अर्थात् 'प्रारम्भिक अवधी के अध्ययन की सामग्री’ में प्रकाशित और अप्रकाशित वे रचनाएँ विचार के केन्द्र में हैं जिनके आधार पर प्रारम्भिक अवधी का भाषा सम्बन्धी विवेचन किया गया है। 'ध्वनि विचार के अन्तर्गत प्रारम्भिक अवधी के व्यंजनों और स्वरों को निर्धारित करने का प्रयत्न किया गया है। प्रारम्भिक अवधी की ध्वनियों को ठीक-ठीक निरूपित करने के लिए आज हमारे पास कोई प्रामाणिक साधन नहीं है। इसलिए इन पर प्राचीन वैयाकरणों तथा अन्य विद्वानों के मतों के प्रकाश में विचार किया गया है। प्रारम्भिक अवधी की क्रियाओं का अध्ययन प्रस्तुत प्रबन्ध का सबसे महत्त्वपूर्ण अंश समझा जाना चाहिए क्योंकि प्रारम्भिक अवधी में ऐसे कई क्रिया-रूपों का पता चला है जो परवर्ती अवधी में या तो बहुत कम प्रयुक्त हैं या अप्रयुक्त हैं। उपसंहार के अन्तर्गत प्रारम्भिक अवधी की कुछ विशेषताओं को ध्यान में रखकर अवधी काव्यों की भाषा से उसका अन्तर स्पष्ट कर दिया गया है। आशा है, पाठक इस पुस्तक को सार्थक पाएँगे। प्रारम्भिक अवधी भाषा के अध्ययन से प्रकट होता है कि वह अपनी समसामयिक कई भाषाओं के कई रूपों की सहभागिनी थी जो अब उसके नहीं हैं अर्थात् अवधी पंजाबी, ब्रजी, भोजपुरी, मैथिल, बंगला से आज की अपेक्षा अधिक निकट थी। प्राचीन अवधी में परवर्ती अवधी की अपेक्षा लोक प्रचलित रूपों का प्रयोग अधिक हुआ है। सम्भवत: जायसी के पद्मावत ने अवधी को साहित्यिक और परिनिष्ठित भाषा के रूप में पूर्णत: प्रतिष्ठित कर दिया जिसके कारण उसमें लोक प्रचिलित रूपों का प्रयोग अपेक्षाकृत कम हो गया। —पुस्तक से