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Pratinidhi Kahaniyan : Balwant Singh

by Balwant Singh
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“...खेतों की मुंडेरों पर से दीखते बबूल, कीकर, कच्चे घरों से उठता धुआं, रात के सुनसान में सरपट भागते घोड़े, छवियाँ लाशकाते डाकू, घरों से पेटियां धकेलते चोर, कनखियों से एक-दूसरे को रिझाते जवान मर्द और औरतें, भोले-भाले बच्चे, लम्बे सफ़र समेटते डाची सवार-समय और स्थितियों से सीनाजोरी करते बलवंत सिंह के पात्र पाठक को देसी दिलचस्पियों से घेरे रहते हैं। कुछ का गुजरने के लिए जिस साहस की जरूरत इन्हें है, उसे कलात्मक उर्जा से मंजिल तक पहुँचाने का फन लेखक के पास मौजूद है। बलवंत सिंह के यहाँ धुंधलके और ऊहापोह की झुरमुरी कहानियां नहीं, दिन के उजाले में, रात के एकांत में स्थितियों को चुनौती देते साधारण जन और उनका असाधारण पुरुषार्थ है। बलवंत सिंह सिर्फ आदमी को ही नहीं रचते, कहानी की शर्त पर उसके खेल और कर्म को भी तरतीब देते हैं। वे शोषण और संघर्ष का नाम नहीं लेते, इसे केंद्र में लाते हैं।– कृष्णा सोबती