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Pratinidhi Kahaniyan : Kashinath Singh

by Kashinath Singh
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साठोत्तरी पीढ़ी के जिन प्रगतिशील कथाकारों ने हिंदी कहानी को नई जमीन सौंपने का काम किया, काशीनाथ सिंह का नाम उनमे विशेष महत्त्व रखता है ! इस संग्रह में उनकी बहुचर्चित कहानियों शामिल की गई हैं ! ध्वस्त होते पुराने समाज, व्यक्ति-मूल्यों तथा नई आकांक्षाओं के बीच जिस अर्थद्वन्द को जन-सामान्य झेल रहा है, उसकी टकराहटों से उपजी, भयावह अन्तःसंघर्ष को रेखांकित करती हुई ये कहानियों पाठक को सहज ही अपनी-सी लगने लगती हैं ! इनमे हम वर्तमान राजनितिक ढाँचे के तहत पनप रही मूल्य-भ्रशंता को भी देखते है और जीवन-मूल्यों की पतनशील त्रासदी को भी महसूस करते हैं ! समकालीन यथार्थ की गहरी पकड़, भाषा-शैली की सहजता और एक खास किस्म का व्यग्य इस सन्दर्भ में पाठक की भरपूर मदद करता है ! वह एक प्रगतिशील मूल्य-दृष्टि को अपने भीतर खुलते हुए पाटा है, क्योंकि काशीनाथ सिंह के कथा-चरित्र विभिन्न विरोधी जीवन-स्थिरियों में पड़कर स्वयं अपना-अपना अंतःसंघर्ष उजागर करते चलते हैं और इस प्रक्रिया में लेखकीय सोच की दिशा सहज ही पाठकीय सोच से एकमेक हो उठती है !