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Punjabi Natak Aur Rangmanch Ki Ek Sadi

by Satish Kumar Verma
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Product Description
किसी भी भाषा में नाट्‌यकला का विकास उस भाषा एवं क्षेत्र की रंगमंचीय स्थिति के परिप्रेक्ष्य में ही का जा सकता है । यह एक दोधारी प्रक्रिया है । रंगमंच की बुनियादी जरूरत नाटक यानी आलेख हे जिसके बिना रंगमंच नहीं हो सकता । दूसरी तरफ रंगमंचीय परिदृश्य नाटक यानी आलेख को प्रभावित करता है । मूलत: किसी भाषा एवं क्षेत्र का रंगमंच ही नाट्‌यलेखन की प्रेरक भूमि है क्योंकि उसी के लिए नाटक लिखा जाता- है । इसे यूँ कहा जाए कि नाटक से रंगमंच जन्म लेता है और रंगमंच से नाटक जन्म लेता हे तो अतिशयोक्ति नहीं होगी । जाहिर है कि किसी भी भाषा के नाटक राव रंगमंच का अलग-अलग अध्ययन सम्पूर्ण अध्ययन नहीं हो सकता । इसलिए किसी भाषा के नाटक का अध्ययन करने हेतु आदर्श विधि यही होनी चाहिए कि उस भाषा के नाटक एवं रंगमंच को सम्मिलित रूप से का जाए । इसी दृष्टि से लिखी गई यह पुस्तक 'पंजाबी नाटक और रंगमंच की एक सदी' की यात्रा को परिलक्षित करने का सतत प्रयास है । पंजाबी नाटक एवं रंगमंच की सम्मिलित धारा निरन्तर बह रही है । इस पुस्तक में पंजाबी नाटक और रंगमंच की एक सदी का रेखांकन व मूल्यांकन किया गया है जिसका उद्देश्य यह जानना है कि साहित्य और कला की इन सशक्त विधाओं अर्थात् नाटक एवं रंगमंच ने किस तरह एक ओर पंजाबी भाषा में अपनी जड़ें जमाई व पंजाबी नाट्‌य-मंच एक परम्परा में तब्दील होने में समर्थ हुआ और दूसरी तरफ कैसे पंजाबी नाट्‌य-मंच ने पंजाब के जनजीवन को प्रभावित किया तथा पंजाब के सामाजिक, मनोवैज्ञानिक व राजनीतिक सरोकारों से वाबस्ता होकर जनचेतना जगाने में एक निर्णायक भूमिका निभा सका ।

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