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Ret Par Khema

by Jabir Hussain
₹ 300.00
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Product Description
एक दिन, तेज बहने वाली इन हवाओं ने, आधी रात, मेरे दरवाजे पर दस्तक दी थी, मुझे नाम से पुकारा था ! मेरे सहज भाव से दरवाजा खोल देने पर, इन हवाओं ने मेरे सीने पर जहर-बुझे खंजरों से हमला कर दिया था ! खून से तर-ब-तर मेरा बदन मेरे कमरे के फर्श पर बरसों-बरस लोटता रहा था ! बरसों-बरस, गर्द-व्-ख़ाक में डूबा रहा था ! आज फिर ये हवाये चक्रवात बनकर उभरी हैं, और मुझे अपने तूफानी बहाव में समेट लेना चाहती हैं ! मेरे दिल में इन हवाओं के लिए कोई शिकायत नहीं हैं ! मुझे इनके प्रति कोई गिला नहीं है ! कभी-कभी मैं सोचता हूँ, ये हवायें ही मेरे वजूद की जड़ों को मजबूती देती हैं, और मेरा इम्तेहान भी लेती रहती हैं ! मुझे हिला-डुला कर, मुझे हिचकोले दे-देकर ये हवाये इत्मीनान कर लेना चाहती हैं कि मैं जिन्दा हूँ ना, हालात की गोद में कभी न टूटने वाली नींद सो तो नहीं गया ! हवाओं, तेज बहो, और तेज बहो ! आँधियों और चक्रवात की मानिंद बहो ! मेरे पहले से ही लहूलुहान सीने पर अपने जहरीले तीरों की बारिश करो ! हवाओं, मुझे लील जाओ, ताकि खुदा की बनाई इस धरती पर कहीं मेरे वजूद का कोई निशान बाकी न रहे ! हवाओं, बहो, तेज बहो ! और तेज बहो ! हमारे और तुम्हारे लिए एक-दूसरे को आजमाने का इससे बेहतर मौसम और कब आयेगा !