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Rukogi Nahin Radhika

by Usha Priyamvada
Original price ₹ 150.00
Current price ₹ 135.00
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Product Description
यह लघु उपन्यास प्रवासी भारतीयों की मानसिकता में गहरे उतरकर बड़ी संवेदनशीलता से परत-दर-परत उनके असमंजस को पकड़ने का सार्थक प्रयास है। ऐसे लोग, जो जानते हैं कि कुछ साल विदेश में रहने पर भारत में लौटना संभव नहीं होता पर यह भी जानते हैं कि सुख न वहाँ था न यहाँ है। स्वदेश में अनिश्चितता और सारहीनता का एहसास, वापसी पर परिवार के बीच होने वाले अनुभव, जैसे मुँह में ‘कड़वा-सा स्वाद’ छोड़ देते हैं। यह अनुभव विदेश में पहले ‘कल्चरल शॉक’ और स्वदेश में लौटने पर ‘रिवर्स कल्चरल शॉक’ से गुजरती नायिका को कुछ ऐसा महसूस करने पर बाध्य कर देता है: ‘‘मेरा परिवार, मेरा परिवेश, मेरे जीवन की अर्थहीनता, और मैं स्वयं जो होती जा रही हूँ, एक भावनाहीन पुतली-सी।’’ पर यह उपन्यास सिर्फ अकेली स्त्री के अनुभवों की नहीं, आधुनिक समाज में बदलते रिश्तों की प्रकृति से तालमेल न बैठा पानेवाले अनेक व्यक्तियों और संबंधों की बारीकी से पड़ताल करता है। एक असामान्य पिता की सामान्य संतानों के साथ असहज संबंधों की कथा है यह उपन्यास। ऐसे लोग जिनके पारिवारिक सीमांतों पर बाहरी पात्रों की सहज दस्तक इन रिश्तों को ऐसे आयाम देती है, जो ठेठ आधुनिक समाज की देन हैं।