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Samar Shesh Hai

by Abdul Bismillah
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अब्दुल बिस्मिल्लाह बहुचर्चित और बहुमुखी प्रतिभा-संपन्न रचनाकार हैं ! झीनी-झीनी बीनी चदरिया उपन्यास के लिए इन्हें 'सोवियत भूमि नेहरु पुरस्कार' से भी सम्मानित किया जा चुका है ! समर शेष है अब्दुल बिस्मिल्लाह का आत्म-कथात्मक उपन्यास है ! कथा-नाटक है , सात-आठ साल का मात्रिविहीन एक बच्चा, जो कि पिता के साथ-साथ स्वयं भी भारी विषमता से ग्रसित है ! लेकिन पिता का असामयिक निधन तो उसे जैसे एक विकत जीवन-संग्राम में अकेला छोड़ जाता है ! पिता के सहारे उसने जिस सभ्य और सुशिक्षित जीवन के सपने देखे थे, वे उसे एकाएक ढहते हुए दिखाई दिए ! फिर भी उसने साहस नहीं छोड़ा और पुरुषार्थ के बल पर अकेले ही अपने दुर्भाग्य से लड़ता रहा ! इस दौरान उसे यदि तरह-तरह के अपमान झेलने पड़े तो कोशोरावस्था से युवावस्था की ओर बढ़ते हुए एक युवती के प्रेम और उसके ह्रदय की समस्त कोमलता का भी अनुभव हुआ ! लेकिन इस प्रक्रिया में न तो वह कभी टूटा या पराजित हुआ और न ही अपने लक्ष्य को भूल पाया ! कहने कि आवश्यकता नहीं कि विपरीत स्थितियों के बावजूद संकल्प और संघर्ष के गहरे तालमेल से मनुष्य जिस जीवन का निर्माण करता है, यह कृति उसी की सार्थक अभिव्यक्ति है !

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P.N.
Very good book. I just wish the website to do more publicity so that people know of this good site.