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Satya Ke Mere Prayog

by Mohandas Karamchand Gandhi
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Product Description
विश्व के स्वप्नदर्शी और युगान्तरकारी नेताओं में सर्वाधिक चर्चित और देश-काल की सीमाओं को लाँघकर एक प्रतीक बन जानेवाले महात्मा गांधी की यह आत्मकथा न किसी परिचय की मुहताज है और न किसी प्रशंसा की। अनेक भाषाओं और देशों के असंख्य पाठकों के मन में राजनीति, समाज और नैतिकता से जुड़े सवालों को जगाने विचलित करने वाली इस पुस्तक का यह मूल गुजराती से अनूदित प्रामाणिक पाठ है। समाज और राजनीति की धारा में गांधी जी ने असहयोग और अहिंसा जैसे व्यावहारिक औजारों से एक मानवीय हस्तक्षेप किया, वहीं अपने निजी जीवन को उन्होंने सत्य, संयम और आत्मबल की लगभग एक प्रयोगशाला की तरह जिया। नैतिकता उनके लिए सिर्फ समाजोन्मुख, बाहरी मूल्य नहीं था, उनके लिए वह अपने अन्तःकरण के पारदर्शी आइने में खड़ा एक नग्न प्रश्न था, जिसका जवाब व्यक्ति को अपने सामने, अपने को ही देना होता है। अपने स्व की कसौटी ही जिसकी एकमात्र कसौटी होती है। यह पुस्तक गांधी जी के इसी अविराम नैतिक आत्मनिरीक्षण की विवरणिका है। इस चर्चित पुस्तक की यह पुनर्प्रस्तुति यह बात ध्यान में रखते हुए की जा रही है कि महान कृतियों का अनुवाद बार-बार होते रहना चाहिए। गुजराती और अंग्रेजी से कई उल्लेखनीय अनुवाद कर चुके सूरज प्रकाश ने इस अनुवाद में प्रयास किया है कि गांधी जी की इस सर्वाधिक पढ़ी जानेवाली कृति को आज का पाठक उस भाषा-संवेदना रोशनी में पढ़ सके जो आजादी के बाद हमारी चेतना का हिस्सा बनी है।