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Sobti Ek Sohbat

by Krishna Sobti
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हिंदी साहित्य के समकालीन परिदृश्य पर कृष्णा सोबती एक विशिष्ट रचनाकार के रूप में समादृत हैं । यह कृति उनके बहुचर्चित कथा-साहित्य, संस्मरणों, रेखाचित्रों, साक्षात्कारों और कविताओं से एक चयन है । उनके कुछ विचारोत्तेजक निबंधों को भी इसमें रखा गया है । इसके साथ ही 'जिंदगीनामा 2 ' से कुछ महत्त्वपूर्ण अंश भी इसमें शामिल हैं, जिसे वे अभी लिख रही हैं । उल्लेखनीय है कि अपनी विभिन्न कथाकृतियों के माध्यम से कृष्णा सोबती ने संस्कृति, संवेदना और भाषा-शिल्प की दृष्टि से हिंदी साहित्य को एक नई व्यापकता प्रदान की है । इस संदर्भ में उनकी इस मान्यता से सहमत हुआ जा सकता है कि हिंदी अगर किसी प्रदेश-विशेष या धर्म-वर्ग की भाषा नहीं है तो उसे अपने संस्कार को व्यापक बनाना होगा । वस्तुत: उन्होंने बने-बनाए साँचे, चौखटे और चौहद्‌दियाँ हर स्तर पर अस्वीकार की हैं त था रचना के साथ-साथ स्वयं भी एक नया जन्म लिया है । उनके लिए रचनाकार की ही तरह रचना भी एक जीवित सच्चाई है; उसकी भी एक स्वायत्तता है । उन्हीं के शब्दों में कहें तो 'रचना न बाहर की प्रेरणा से उपजती है, न केवल रचनाकार के मानसिक दबाव और तनाव से । रचना और रचनाकार-दोनों अपनी-अपनी स्वतंत्र सत्ता में एक-दूसरे का अतिक्रमण करते हैं और एक हो जाते हैं । इसी के साथ लेखक पर रचना की शर्तें लागू हो जाती हैं और रचना पर लेखकीय संयम और अनुशासन ।' कहना न होगा कि यह एक ऐसी कृति है जो न सिर्फ एक लेखक की बहुआयामी रचनाशीलता को समझने का अवसर जुटाती है बल्कि समकालीन रचनात्मकता से जुड़े अनेक सवालों को भी हमारी चिंताओं में शामिल करती है ।