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Sone Ka Qila

by Satyajit Rai
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Product Description
सत्यजित राय ने इस उपन्यास में अपने किशोर पाठकों को बंगाल से राजस्थान तक की यात्रा कराई है - कलकत्ता से जैसलमेर तक की यात्रा। यह उपन्यास एक ऐसे किशोर बालक मुकुल की कथा है जिसे पूर्व जन्म की बातें याद रहती हैं। साथ ही यह एक ऐसे जासूस की कथा है जिसे इस प्रकार के सारे रहस्य खोज निकालने का शौक है। अपनी इस विद्या में वह पूरी तरह निपुण है। ये जासूस फेलूदा हैं जिनका पूरा नाम है प्रदोष मित्तिर। मुकुल के पूर्व जन्म की बातों की खोज करने निकले फेलूदा। मुकुल के पूर्व जन्म में एक सोने का किला था, एक जगह कहीं गड़ा खजाना और उसके घर के पास ही कहीं लड़ाई चल रही थी। फेलूदा यह सब खोजते-खोजते कलकत्ता से जैसलमेर पहुँच गए। सोने का किला व गड़ा खजाना कइयों को ललचा गया था। गड़ा खजाना कौन खोज निकाले और कौन उस पर कब्जा करे, इस पर दूसरी दौड़ भी शुरू हो गई थी। फेलूदा जानते थे कि लोग उनका पीछा करेंगे। वे सतर्क थे। पीछा करनेवाले बदमाशों ने बड़ा जाल रचा, मगर फेलूदा मात खानेवाले नहीं थे। पक्के जासूस थे। सत्यजित राय का यह किशोर उपन्यास पाठकों को खूब मजे से राजस्थान के कई शहर किसनगढ़, बीकानेर, जोधपुर, पोकरण, रामदेवरा और फिर जैसलमेर दिखाता है। ‘सोने का किला’ उनके चार किशोर उपन्यासों में से एक है। इस उपन्यास के चित्र भी उन्होंने स्वयं बनाए हैं। बाहर का दृश्य भी अद्भुत है। दोनों तरफ मीलों दूर तक लहरीली रेत बिछी है—इसमें कहीं भी एक भी घर नहीं है, कोई एक भी आदमी नहीं और कोई पेड़ तक नहीं। लेकिन इसे पूरी तरह रेगिस्तान भी नहीं कहा जा सकता। क्योंकि बालू के बीच-बीच में काफी बड़े हिस्से में सूखी घास है, और कई जगह लाल मिट्टी व लाल-काले कंकड़-पत्थरोंवाली सख्त जमीन भी है। ऐसे बीहड़ और वीरान स्थान के उस पार कोई शहर बसा हुआ है, इस पर चाहते हुए भी भरोसा नहीं होता। —इसी पुस्तक से

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A.S.
Awesome Book