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Sookha Patta

by Amarkant
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वर्ष 1959 में प्रकाशित सूखा पत्ता को अमरकांत की ही नहीं, बल्कि उस दौर में लिखे गए समूचे उपन्यास-साहित्य की एक विशिष्ट उपलब्धि माना जाता है ! आजादी से पहले के पूर्वी उत्तर प्रदेश का कस्बाई परिवेश और इसके किशोर कथा-नायक कृष्ण का चित्रण यहाँ असाधारण रूप में हुआ है ! कृष्ण के मित्र मनमोहन के रूप में किशोरावस्था की मानसिक विकृतियों, कृष्ण के 'क्रातिकारी' रूझान के बहाने अपरिपक्व युवा मानस की कमजोरियों और कृष्ण-उर्मिला-प्रेमकथा के सहारे समाज की मानव-विरोधी रूढ़ परम्पराओं पर तीखा प्रहार इस उपन्यास में किया गया है ! कोशोर वय से युवावस्था में प्रवेश करते छात्र-जीवन की अनुभव-विविधता के बीच अनायास जुड़ गए क्रिसन-उर्मिला प्रसंग को लेखक ने जिस सूक्षमता और विस्तार से उकेरा है, उसकी ताजगी, सहजता और सादगी हिंदी कथा-साहित्य की बेजोड़ उपलब्धि है ! इस प्रणय-गाथा की पवित्र और गहन आत्मीय सुगंध मन में कहीं गहरे पैठ जाती है; और साथ ही यह तकलीफ भी कि सामाजिक रूढ़ियों की दीवार आखिर कब तक दो युवा-हृदयों के बीच उठाई जाती रहेगी ?