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Swami

by Mannu Bhandari
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‘स्वामी’ सुप्रसिद्ध कथाकार मन्नू भंडारी का भावप्रवण विचारोत्तेजक उपन्यास है! आत्मीय रिश्तो के बीच जिस सघन अंतर्द्वंद का चित्रण करने के लिए मन्नू भंडारी सुपरिचित है, उसका उत्कृष्ट रूप ‘स्वामी’ में देखा जा सकता है! सोदमिनी, नरेन्द्र और घनश्याम के त्रिकोण में उपन्यास की कथा विकसित हुई है! सामाजिक और पारिवारिक परिस्थितिया तो हैं ही! कथारस के साथ उपन्यास में स्थान-स्थान पर ऐसे प्रश्न उठाए गए हैं जिनकी वर्तमान में प्रसंगिकता स्वयंसिद्ध है! जैसे, ‘जिसे आत्म कहते हैं वह क्या औरतों की देह में नहीं है? उनकी क्या स्वतंत्र सत्ता नहीं है? वे क्या सिर्फ आई थीं मर्दों की सेवा करनेवाली नौकरानी बनाने के लिए? सुदामिनी के जीवन में अथवा इस वृतान्त में ‘स्वामी’ शब्द की सार्थकता क्या है, इसे लेखिका ने इन शब्दों में स्पस्ट किया है- ‘घनश्याम के प्रति उनका पहला भाव प्रतिरोध और विद्रोह का है, जो क्रमशः विरक्ति और उदासीनता से होता हुआ सहानुभूति, समझ, स्नेह, सम्मान की सीढ़ियों को लांघता हुआ श्रद्धा और आस्था तक पहुंचता है; और यहीं ‘स्वामी’ शीर्षक पति के लिए पारस्परिक संबोधन मात्र न रहकर, उच्चतर मनुष्यता का विश्लेषण बन जाता है, ऐसी मनुष्यता जो ईश्वरीय है!’ एक पठनीय और संग्रहणीय उपन्यास!