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Description

Author: Shariq Kaifi

Languages: Hindi

Number Of Pages: 128

Binding: Perfect Paperback

Release Date: 01-12-2021

Details: एक बात अर्ज़ कर दूँ कि शारिक़ की शायरी मासूम शायरी हरगिज़ नहीं है वो अपनी शायरी में जो सवाल उठाता है वो भी मासूम नहीं हैं और उसे किसी किस्म का सवाल उठाने की ज़रूरत भी नहीं है। मुझे तो कभी कभी वाक़ई शक़ होता है कि वो रिवायती मायने में शायर है भी की नहीं। मुझे तो वो एक बेहरम क़िस्म का वजूदी नज़र आता है, एक ऐसा वजूदी जिसकी लड़ाई और कशमश भी अपने वजूद से ही है। वो उनमे से नहीं है जो अपने “होने” के इरफ़ान के वसीले से खुद को “शय” से अलग कर लेते हैं बल्कि उसकी कोशिश अपने “होने” के इरफ़ान में “शय” के “न होने” को भी शामिल कर लेना है। इसलिए शारिक़ कैफ़ी की शायरी में तंज़ अपने नफ़्सियाती हरबे शमित बिलकुल अनोखे और मुनफ़रिद अंदाज़ में सामने आता है। असल बात ये है कि इश्क़ की मासूमियत से शारिक़ कैफ़ी की शायरी को दूर का भी इलाका नहीं, हाँ मगर मासूम से क़ारी के लिए उसकी शायरी उपरी सतह पर यही इल्तबास पैदा करती है। यही वो इबहाम है जो उस के अशआर को कागज़ पर एक धुंध सी पैदा करने पर मजबूर करता है, अगर्चा इबहाम के इस मायनी आफरीं गुबार में वो नादीदा आग भी पोशीदा होती है जिस से अक्सर वो कागज़ भी जलता हुआ महसूस होता है जिस पर शारिक़ का कोई शेर लिखा हो। ख़ालिद जावेद उर्दू डिपार्टमेंट, जामिया मिलिया इस्लामिया-नई दिल्ली