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Vaigyanik Bhautikvad

by Rahul Sankrityayan
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'वैज्ञानिक भौतिकवाद' आज के वैज्ञानिक युग के उस चरण की व्याख्या है जिसमे साइंस के नाम पर मृत विचारों की अपेक्षा नये वैज्ञानिक विचारों व आलोक में मानवीय नैतिकता, धर्म, समाज, दर्शन, मूल्यवत्ता और मानवीय संबंधों की व्याख्या की गयी है | जर्मन दार्शनिक हीगेल ने जिस द्वंद्वात्मक सिद्धांत पर आध्यात्मिकता की व्याख्या की थी, मार्क्स ने उसी द्वंद्वात्मक सिद्धांत के प्रयोग से भौतिकवाद की व्याख्या की | राहुल जी की पुस्तक वैज्ञानिक भौतिकवाद मूलतः द्वंद्वात्मक भौतिकवाद को ही प्रतिपादित करने के लिए लिखी गयी पुस्तक है | पुस्तक को विद्वान लेखक ने तीन मुख्या अध्यायों में बाँटकर, इतिहास, दर्शन, समाजशास्त्र और धर्म आदि की पूरी व्याख्या प्रस्तुत की है | यह पुस्तक राहुल जी ने सबसे पहले 1942 में लिखी थी जबकि देश में गाँधी जी और गांधीवादी का बड़ा प्रबल समर्थन व्याप्त था | इसमें भारतीय सन्दर्भ को लेकर गांधीवाद की विवेचना है | भारतीय चिंतन और दर्शन की दृष्टि से यह पुस्तक सर्वप्रथम भारतीय साहित्य में विशेषकर हिंदी में एक बहुत बड़ी कमी की पूर्ती करती है | दार्शनिक दृष्टि से 'वैज्ञानिक भौतिकवाद' अपनी छोटी-से काया में ही अट्ठारहवी और उन्नीसवीं शताब्दी के यूरोपीय चिंतन को सूत्र रूप में भारतीय सन्दर्भ के साथ प्रस्तुत करती है | वस्तुतः इस पुस्तक के अध्ययन से कोई भी भारतीय भाषा-भाषी पाश्चात्य चिंतन-प्रणाली को भली-भांति जान सकता है |