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Description

इस पुस्तक में स्त्री समस्यायें, स्त्री के बीच पसरे आन्दोलनों और भारतीय सन्दर्भों में स्त्री–चिन्तन को बहुत सुलझे ढंग से विश्लेषित किया गया है । वर्गगत, वर्णगत, नस्लगत, धर्मगत शोषण का खामियाजा सबसे अधिक स्त्रियों को ही भुगनता पड़ रहा है । स्त्री को हाशिए के भी हाशिए पर बनाये रखने की कोशिश सदियों से होती रही है, लेकिन आज यह अत्यन्त सुखद है कि स्त्री–लेखन में रत अनेक स्त्री–लेखिकाएँ शीर्ष पर अवस्थित हैं । उन्हें लेखन की दुनिया में केन्द्रीय स्थान हासिल हुआ है, जहाँ वे स्त्री–चेतना से जुड़े तमाम प्रश्नों से रू–ब–रू हो उनको संश्लिष्ट रूप में बेबाक ढंग से प्रस्तुत करने में सफल रही हैं, चाहे वे कहानियाँ हों या उपन्यास, कविता या अन्य विधा सम्यक् चित्र उभरे हैं । उन्होंने धर्म, आस्था, परम्परा, मूल्य एवं व्यवस्था के प्रति जो असन्तोष व्यक्त किया है, इनके मूल में मौजूद कारणों, विरोधाभासी जीवन की सामाजिक– सांस्कृतिक समस्याओं को समग्रता में मूल्यांकन करने में समर्थ हुई हैं । जाहिर है कि हमारे यहाँ स्त्री–चिन्तन के क्षेत्र में नये आयामों का उद्घाटन हो रहा है, उसका क्षेत्र व्यापक हो रहा है । जीवन के हर क्षेत्र में उसकी व्यापक उपस्थिति से अब इनकार नहीं किया जा सकता । स्त्रियों ने अपने विरुद्ध ढाये जा रहे जुल्मों का अतिक्रमण कर आज खुले में पैर रखना सीख लिया है । प्रखरता, तेजस्विता और वैचारिक दृष्टि से सम्पन्न आज की स्त्रियाँ दमनकारी शक्तियों से निजात पाने की ओर गतिशील हैं । इस तरह से स्त्री–प्रतिरोध बढ़ा अवश्य है, पर दमन भी कम नहीं हो रहा है । प्रश्न उठता है कि क्या उत्तरोत्तर सशक्त होती स्त्री की संवेदित दृष्टि पुरुष वर्चस्ववाद के कठोर ढूह को हिलाने में समर्थ हो पायी है ?