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Zindaani

by Saroj Vashishth
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जितनी बहादुरी से समय की क्षणभंगुरता को सरोज ने अपने आंचल में संभाला है उसे पल पल जिया है, उसे व्यर्थथा में खोया नहीं है वह सबके बलबूते की बात नहीं है। मुझे लगता है किसी के जीवन के समानांतर चलकर उसका साक्षित्व रखना उसमें अहष्य रूप में दाखिल हो जाना एक प्रयास है, घटना नहीं है, एक उप-उत्पत्ति है-उसकी अपनी समग्रता है। सरोज आज कंप्यूटर पर धड़ाधड़ काम करती है। आस-पास के घरों के लोगों से ही नहीं परिंदों से, चीड़ और पाईन वृक्षों से रिश्ता जोड़े अपने सेब के बगीचे के मालियों पड़ौसी किसानों से हँसी ठट्ठा करती अपनी अहंकार हीन आत्मा में कहीं गहराई से अपने विद्वान बेटे गप्प जी को जी रही है। ज़िन्दानी कहानी संग्रह में हर जगह सरोज है और उनकी उठती गिरती साँस है, जो अब अपने विदेश के बसे पुत्र में साथ तो उठती गिरती ही है। अपने आस-पास प्रकृति के साथ जी रहे पौधों, दरख्तों और पक्षियों के साथ भी वैसे ही धुली रहती है जैसे अपने मित्रों, सहयोगियों और सहकर्मियों के साथ। सरोज जी कभी अकेली नहीं है, उनके पास से गुज़र जाने वाला भी उनका अपना हो जाता है। मैं उनके इस रूप को, व्यक्तित्व को सलाम करती हूँ। - पदमा सचदेवा

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